कभी चम्मच चलाती हूँ,कभी ढक्कन उठाती हूँ,मगर पत्थर नहीं गलते
न जाने कबसे बैठी हूँ,,,,? बड़े से दैगचे में फ़िर, बहुत सा पानी डाला है, कभी चम्मच चलाती हूँ, कभी ढक्कन उठाती हूँ, मगर पत्थर नहीं गलते,,,, 😢😢😢 मेरे सब बच्चे भूखे हैं, मुझे भी भूख खाती है, न सालन है न रोटी है, फ़क़त पत्थर ही बाक़ी हैं, बस पकाने का सलीक़ा है, बहुत आसान तरीक़ा है, मगर पत्थर नहीं गलते,,,, 😢😢😢 सुना है दौर वो भी था, ख़लीफ़ा ख़ुद निकलता था, कोई भूखा,,,, कोई प्यासा, अगर उस रात होता था, भरा गंदुम से इक थैला, कमर पर लाद लाता था, यहाँ कोई नहीं आया,,,, 😢😢😢 न जाने कबसे बैठी हूँ,,,,? मुझे जो भी मयस्सर है, मैं बच्चों को खिला तो दूँ, मगर पत्थर नहीं गलते,,,, 😢😢😢 मगर पत्थर नहीं गलते, ,,, 😥😥😥